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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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भीष्म उवाच
न तं पश्याम्यहं वृक्षं पर्वतं वापि तं दृढम् |  २१   क
यो न वाय़ुवलाद्भग्नः पृथिव्यामिति मे मतिः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति