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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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शल्मलिरु उवाच
न मे वाय़ुः सखा व्रह्मन्न वन्धुर्न च मे सुहृत् |  २३   क
परमेष्ठी तथा नैव येन रक्षति मानिलः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति