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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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नारद उवाच
शल्मले विपरीतं ते दर्शनं नात्र संशय़ः |  २७   क
न हि वाय़ोर्वलेनास्ति भूतं तुल्यवलं क्वचित् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति