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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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नारद उवाच
स त्वमेवंविधं वाय़ुं सर्वसत्त्वभृतां वरम् |  ३१   क
न पूजय़सि पूज्यं तं किमन्यद्वुद्धिलाघवात् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति