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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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नारद उवाच
मम रोषः समुत्पन्नस्त्वय़्येवं सम्प्रभाषति |  ३३   क
व्रवीम्येष स्वय़ं वाय़ोस्तव दुर्भाषितं वहु ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति