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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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नारद उवाच
तैश्चापि नैवं दुर्वुद्धे क्षिप्तो वाय़ुः कृतात्मभिः |  ३५   क
ते हि जानन्ति वाय़ोश्च वलमात्मन एव च ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति