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वन पर्व
अध्याय १५०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः संहृत्य विपुलं तद्वपुः कामवर्धितम् |  १   क
भीमसेनं पुनर्दोर्भ्यां पर्यष्वजत वानरः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति