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वन पर्व
अध्याय १५०
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वैशम्पाय़न उवाच
विजय़स्य ध्वजस्थश्च नादान्मोक्ष्यामि दारुणान् |  १५   क
शत्रूणां ते प्राणहरानित्युक्त्वान्तरधीय़त ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति