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वन पर्व
अध्याय १५०
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वैशम्पाय़न उवाच
स तानि रमणीय़ानि वनान्युपवनानि च |  १८   क
विलोडय़ामास तदा सौगन्धिकवनेप्सय़ा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति