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वन पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि सुमहानग्निः कक्षं दहति सानिलः |  १७   क
तथा दहति राजन्यो व्राह्मणेन समं रिपून् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति