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उद्योग पर्व
अध्याय १५०
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जनमेजय़ उवाच
विराटद्रुपदाभ्यां च सपुत्राभ्यां समन्वितम् |  २   क
केकय़ैर्वृष्णिभिश्चैव पार्थिवैः शतशो वृतम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति