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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
कुण्डले वालसूर्याभे मालां हेममय़ीं शुभाम् |  १०   क
धारय़न्विपुलं कांस्यं कवचं च महाप्रभम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति