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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
प्रतिहत्य तु तां माय़ां दिव्येनास्त्रेण राक्षसीम् |  १०४   क
आजघान हय़ानस्य शरैः संनतपर्वभिः ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति