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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ते भग्ना विकृताङ्गाश्च छिन्नपृष्ठाश्च साय़कैः |  १०५   क
वसुधामन्वपद्यन्त पश्यतस्तस्य रक्षसः ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति