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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
तत्र काकसहस्राणि तां निशां पर्यणामय़न् |  ३५   क
सुखं स्वपन्तः कौरव्य पृथक्पृथगपाश्रय़ाः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति