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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
यथा सुखेन गच्छेतां जय़द्रथवधं प्रति |  १४   क
तथा प्रकुरुत क्षिप्रमिति सैन्यान्यचोदय़त् |  १४   ख
तय़ोरभावे कुरवः कृतार्थाः स्युर्वय़ं जिताः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति