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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
तत्र मातङ्गसङ्काशा लोहिताक्षा विभीषणाः |  १३   क
कामवर्णजवा युक्ता वलवन्तोऽवहन्हय़ाः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति