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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
संसक्त इव चाभ्रेण यथाद्रिर्महता महान् |  १५   क
दिवस्पृक्सुमहान्केतुः स्यन्दनेऽस्य समुच्छ्रितः |  १५   ख
रक्तोत्तमाङ्गः क्रव्यादो गृध्रः परमभीषणः ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति