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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
रथाक्षमात्रैरिषुभिः सर्वाः प्रच्छादय़न्दिशः |  १७   क
तस्यां वीरापहारिण्यां निशाय़ां कर्णमभ्ययात् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति