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वन पर्व
अध्याय २४७
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देवदूत उवाच
वीभत्समशुभं वापि रोगा वा तत्र केचन |  १०   क
मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति