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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
तौ प्रगृह्य महावेगे धनुषी भीमनिस्वने |  २३   क
प्राच्छादय़ेतामन्योन्यं तक्षमाणौ महेषुभिः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति