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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ततः पूर्णाय़तोत्सृष्टैः शरैः संनतपर्वभिः |  २४   क
न्यवारय़ेतामन्योन्यं कांस्ये निर्भिद्य वर्मणी ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति