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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
तौ तु विक्षतसर्वाङ्गौ रुधिरौघपरिप्लुतौ |  २७   क
व्यभ्राजेतां यथा वारिप्रस्रुतौ गैरिकाचलौ ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति