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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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धृतराष्ट्र उवाच
किम्प्रमाणा हय़ास्तस्य रथकेतुर्धनुस्तथा |  ३   क
कीदृशं वर्म चैवास्य कण्ठत्राणं च कीदृशम् |  ३   ख
पृष्टस्त्वमेतदाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति