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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽश्मवृष्टिरत्युग्रा महत्यासीत्समन्ततः |  ३५   क
अर्धरात्रेऽधिकवलैर्विमुक्ता रक्षसां वलैः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति