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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
तत्रैकोऽस्त्रवलश्लाघी कर्णो मानी न विव्यथे |  ३८   क
व्यधमच्च शरैर्माय़ां घटोत्कचविनिर्मिताम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति