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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ततस्ते रुधिराभ्यक्ता भित्त्वा कर्णं महाहवे |  ४०   क
विविशुर्धरणीं वाणाः सङ्क्रुद्धा इव पन्नगाः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति