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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
घटोत्कचो विनिर्भिन्नः सूतपुत्रेण मर्मसु |  ४२   क
चक्रं दिव्यं सहस्रारमगृह्णाद्व्यथितो भृशम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति