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विराट पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
गावश्च वहुलास्तत्र न कृशा न च दुर्दुहाः |  १८   क
पय़ांसि दधिसर्पींषि रसवन्ति हितानि च ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति