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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
प्रविद्धमतिवेगेन विक्षिप्तं कर्णसाय़कैः |  ४४   क
अभाग्यस्येव सङ्कल्पस्तन्मोघमपतद्भुवि ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति