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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
घटोत्कचस्तु सङ्क्रुद्धो दृष्ट्वा चक्रं निपातितम् |  ४५   क
कर्णं प्राच्छादय़द्वाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति