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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षमुत्पत्य कालमेघ इवोन्नदन् |  ४८   क
प्रववर्ष महाकाय़ो द्रुमवर्षं नभस्तलात् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति