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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
न चास्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् |  ५१   क
सोऽदृश्यत मुहूर्तेन श्वाविच्छललितो यथा ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति