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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
न हय़ान्न रथं तस्य न ध्वजं न घटोत्कचम् |  ५२   क
दृष्टवन्तः स्म समरे शरौघैरभिसंवृतम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति