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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
वसुधां दारय़ित्वा च पुनरप्सु न्यमज्जत |  ६०   क
अदृश्यत तदा तत्र पुनरुन्मज्जितोऽन्यतः ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति