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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षं रक्षः क्रूरपराक्रमम् |  ६४   क
उत्पपातान्तरिक्षं च जहास च सुविस्वरम् |  ६४   ख
कर्णमभ्याहनच्चैव गजेन्द्रमिव केसरी ||  ६४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति