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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च विहतां माय़ां कर्णेन भरतर्षभ |  ६६   क
घटोत्कचस्ततो माय़ां ससर्जान्तर्हितः पुनः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति