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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
स्मय़न्निव ततः कर्णो दिव्यमस्त्रमुदीरय़त् |  ६९   क
ततः सोऽस्त्रेण शैलेन्द्रो विक्षिप्तो वै व्यनश्यत ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति