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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य समरे भैमसेनिर्महावलः |  ७३   क
प्रादुश्चक्रे महामाय़ां कर्णं प्रति महारथम् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति