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सभा पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
मागधानां सुरुचिरं चैत्यकान्तं समाद्रवन् |  १७   क
शिरसीव जिघांसन्तो जरासन्धजिघांसवः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति