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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
भृत्या मे सुभृतास्तात दीनश्चाभ्युद्धृतो जनः |  २७   क
यातानि परराष्ट्राणि स्वराष्ट्रमनुपालितम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति