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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां पावकः समजाय़त |  ८६   क
महोल्काभ्यां यथा राजन्सार्चिषः स्नेहविन्दवः ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति