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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
स यय़ौ घोररूपेण रथेन रथिनां वरः |  ८९   क
द्वैरथं सूतपुत्रेण पुनरेव विशां पते ||  ८९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति