विराट पर्व  अध्याय १५

वैशम्पाय़न उवाच

स पपात ततो भूमौ रक्षोवलसमाहतः |  ९   क
विघूर्णमानो निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति