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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
निहन्यमानेष्वस्त्रेषु माय़या तेन रक्षसा |  ९८   क
असम्भ्रान्तस्ततः कर्णस्तद्रक्षः प्रत्ययुध्यत ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति