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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा |  ५३   क
आय़ुःक्षय़ो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति