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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
कांस्यं हृत्वा तु दुर्वुद्धिर्हारीतो जाय़ते नरः |  ९९   क
राजतं भाजनं हृत्वा कपोतः सम्प्रजाय़ते ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति