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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
निवर्तमानेन मय़ा महद्दृष्टं ततोऽपरम् |  १   क
पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति