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शान्ति पर्व
अध्याय १५१
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भीष्म उवाच
हिमवत्पृष्ठजः कश्चिच्छल्मलिः परिवारवान् |  २   क
वृहन्मूलो वृहच्छाखः स त्वां वाय़ोऽवमन्यते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति