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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
ततोऽहं शरजालेन दिव्यास्त्रमुदितेन च |  २६   क
न्यगृह्णं सह दैतेय़ैस्तत्पुरं भरतर्षभ ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति