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शान्ति पर्व
अध्याय १५१
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भीष्म उवाच
अहमप्येवमेव त्वां कुर्वाणः शल्मले रुषा |  २३   क
आत्मना यत्कृतं कृत्स्नं शाखानामपकर्षणम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति